दोस्तों सभी को क्रिसमस मुबारक हो, दुआ करता हू की ये क्रिसमस आप सभी की जिंदगी में अपार खुशिया लाये , आज काफी दिनों बाद लिखने का मौका मिला है आजकल थोडा व्यस्त रहता हु क्या करे कम ही इतना होता है की वक़्त ही नहीं मिल पाता
राजगढ़ गए हुए भी काफी दिन हो गए और अब तो लगता है की नए साल में ही जा पाऊंगा, राजगढ़ की तो कोई खबर है नहीं अभी मेरे पास अगर होगी तो आपको जरूर बताऊंगा, दोस्तों अभी मैंने एक नया ब्लॉग बनाया है http://hansodilse.blogspot.com/ जिसमे मैं अपने बचपन के शौक को आगे बढ़ा रहा हू यहाँ मैं अपनी कविताएं आपके साथ शेयर कर रहा हू , अगर वक़्त मिले तो मेरे ब्लॉग पर आये और मेरी कविताओ का आनंद उठाये, दोस्तों नया साल आ रहा है और आप सभी ने नया साल मानाने की तैयारी कर ली होगी और जिन्होंने नहीं की है वो शायद कर लेंगे, दोस्तों धूम धाम से नए साल का स्वागत करे, आप सभी को मेरी और से नए साल की लख लख बधाईया, अब काफी देर हो चुकी है और मुझे नींद भी आ रही है आखिर २:३० बज गए है तो दोस्तों फिर मिलते है चलते चलते, क्रिसमस और नए साल की फिर से शुभकामनाये l
Friday, December 25, 2009
Saturday, November 14, 2009
यार पांच आदमी आएंगे तब फिल्म चलाएगा
गुरुवार को बारिश का मौसम था और अपन राजगढ़ में थे, घर पर सीआईडी (सोनी का टीवी शो, आजकल अपना फेवरेट शो) देख रहा था। तब ही राजीव जैन (मेरा हमनाम दोस्त) का फोन आया, यार टाकिज तक आ जाओ, फिल्म देखेंगे। मैंने कहा राजगढ़ में फिल्म यार क्यूं मजाक कर रहा है। बोला टिकट ले लिए हैं, आ जा। मैं घर पर बिना बोले नवरंग टाकिज तक चला गया। वहां देखा तो बारिश के कारण लोग नदारद, हम सिर्फ तीन जने। दोस्तों ने बताया कि पांच लोग होने की शर्त पर ही यह फिल्म चलाएगा। काफी दिन हो गए थे राजगढ़ के टाकिज में फिल्म देखे अंदर पहुंचे और यूं समçझए हमारे लिए स्पेशल शो चल रहा था। बस नीचे जनरल में कुछ बीस- पच्चीस लोग और आ गए थे। फिल्म थी अक्षय- कैटरीना अभिनीत ब्लू।लोग कम थे इसलिए भाई ने बिना इंटरवेल के सवा छह बजे शुरू हुई फिल्म को साढ़े आठ बजे खत्म। खैर फिल्म की कहानी फिर कभी। पर अपन को कम से कम पांच आदमियों के साथ आने पर फिल्म दिखाने वाला आइडिया ठीक वैसे ही लगा जैसे लापतागंज (सब टीवी का सीरियल) के थिएटर में फिल्म देख रहे हों।
Saturday, October 24, 2009
अब तांगे नहीं दिखते
अब अपने राजगढ से तांगे (घोडागाडी) गायब हो गए हैं। उनकी जगह ऑटो ने ले ली है। यूं तो समय के साथ बदलाव जरूरी है, पर परिवहन का पुराना साधन गायब हो गया है। यह सोचकर दुख होता है। मुझे याद है बचपन में तीन जगह तांगे दिखाई देते थे।पहला राजगढयहां स्टेशन से गोल मार्केट तक का तीन रुपए में तांगे के सफर में मजा आता था। बाद में यह किराया पांच रुपए हो गया। तांगे चार-पांच से घटकर एक ही रह गया। और 2008 आते आते तांगे खत्म हो गए। इनकी जगह ऑटो ने ले ली है, बेशक ये जल्दी पहुंचा देते हैं। पर जो मजा तांगे में आता था वह ऑटो में नहीं।
तांगे वाली दूसरी जगह थी मंडावरयहां के बस स्टैंड से हमारे पैतृक गांव गढ हिम्मतसिंह तक का तीन किलोमीटर का सफर तांगे में करने में मजा आता था। कई बार तो रास्ते में एक ढलान वाली जगह पानी भरे होने से तांगे को पार करने में मजा आता था। मुझे मेरे बडे भैया बताते हैं कि जब मां के साथ जन्म के बाद जब मैंने पहली बार सफर किया तो वह भी तांगे में किया। बचपन में उन्होंने कई बार कहा कि मम्मी तुम्हे तांगे में अस्पताल से लाई।
तीसरी जगह थी श्रीमहावीरजीमैं दीपावली के अगले दिन कई साल बाद जब जैन तीर्थ क्षेत्र श्रीमहावीरजी गया तो मुझे वहां मंदिर के बाहर एक तांगा देखकर सुकून पहुंचा। यहां तांगा अभी भी मौजूद है। हां बस इसका कारण दूसरा है। तीर्थ यात्री बडे बडे शहरों से बडी गाडियों में आते है तो वे अपने बच्चों का जी बहलाने के लिए गाडी छोड तांगे में सफर करते है। खैर इससे तांगेवाले की रोजी रोटी भी चल रही है और मुझे ब्लॉग के लिए तांगे का फोटो मिल गया वर्ना मैं कब से सोच रहा था तांगे पर लिखने के लिए।
Thursday, October 8, 2009
एक और राजगढ भी है


राजगढ नाम ही ऐसा है। सभी जानते है कि अपने अलवर जिले के राजगढ के अलावा राजस्थान के ही चूरू जिले में भी एक राजगढ है। एक मध्यप्रदेश में और एक हिमाचल में ही।
पर ये राजगढ वो है, जिसके बारे में हमने न तो सुना न ही कभी पढा। चूरू वाले राजगढ का किस्सा जब पढते थे तो हर साल सुनते थे। कभी बोर्ड की मार्कशीट दूसरे राजगढ में चली जाती तो कभी दूसरे राजगढ की यहां आ जाती।
पर हाल ही में मैं भीलवाडा के पास ही एक जैन तीर्थक्षेत्र चंवलेश्वर पार्श्वनाथ गया। रास्ते में एक और छोटा सा गांव दिखा। मैंने कार से बाहर देखा तो एक झोंपडीनुमा पोस्ट आफिस पर राजगढ का बोर्ड लगा था।
मैंने मोबाइल निकालकर गांव में कार देखकर दौडे बच्चों और पोस्ट आफिस की तस्वीर ली और आगे वहां से निकल लिए।
पर मुझे इस बात का बडा अचरज हुआ कि राजस्थान में ही यह तीसरा राजगढ भी है। आपको भी किसी और राजगढ की जानकारी हो तो जरूर बताइएगा।
पर ये राजगढ वो है, जिसके बारे में हमने न तो सुना न ही कभी पढा। चूरू वाले राजगढ का किस्सा जब पढते थे तो हर साल सुनते थे। कभी बोर्ड की मार्कशीट दूसरे राजगढ में चली जाती तो कभी दूसरे राजगढ की यहां आ जाती।
पर हाल ही में मैं भीलवाडा के पास ही एक जैन तीर्थक्षेत्र चंवलेश्वर पार्श्वनाथ गया। रास्ते में एक और छोटा सा गांव दिखा। मैंने कार से बाहर देखा तो एक झोंपडीनुमा पोस्ट आफिस पर राजगढ का बोर्ड लगा था।
मैंने मोबाइल निकालकर गांव में कार देखकर दौडे बच्चों और पोस्ट आफिस की तस्वीर ली और आगे वहां से निकल लिए।
पर मुझे इस बात का बडा अचरज हुआ कि राजस्थान में ही यह तीसरा राजगढ भी है। आपको भी किसी और राजगढ की जानकारी हो तो जरूर बताइएगा।
Friday, October 2, 2009
अपना प्यारा राजगढ़
नमस्कार दोस्तों आज पहली बार इस ब्लॉग पर मैं कुछ लिखने जा रहा हु. लेकिन लिखने से पहले मैं अपने बारे में कुछ बता देना चाहता हु, मेरा नाम कुलदीप सैनी है मैं सराय मोहल्ले में रहता हु फिलहाल मैं जयपुर में रह रहा हु और यहाँ से एनीमेशन का कोर्से कर रहा हु ,
जब मुझे पता चला की राजगढ़ का कोई ब्लॉग है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई और मैंने तुंरत इन्टरनेट पर इसे खोल कर देखा और इसे ज्वाइन कर लिया इस ब्लॉग के लिए मैं राजीव जी को तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हु ,
मैं राजगढ़ का रहने वाला हूँ , राजगढ़ मेरी जन्मभूमि है और मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ और मैं ही क्या वो हर व्यक्ति जो राजगढ़ का निवासी है वो राजगढ़ से बहुत प्यार करता है और करे भी क्यों नहीं ये है ही इतना सुन्दर , चारो और से पहाडियों से घिरा हुआ बाग़, बावडिया मंदिर झरने और बहुत से मनोहर द्रश्य जिन्हें देखकर मन आनंदित हो जाता है
मुझे भी राजगढ़ की बहुत याद आती है जब कभी भी मैं घर जाता हूँ तो वह से आने का दिल ही नहीं करता मगर मजबूरी है की आना पड़ता है अब तो मैं दिवाली पर राजगढ़ जाऊँगा. अपने पुराने दोस्तों से मिलूँगा कुछ दोस्त तो वही राजगढ़ में ही रहते है और कुछ जो बाहर रहते है वो भी दिवाली पर घर आयेंगे, दोस्तों से मिलेंगे घूमेंगे , फिरेंगे , गप्पे लड़ायेंगे , तो दोस्तों मिलते है दिवाली पर अपने प्यारे शहर राजगढ़ में तब तक के लिए अलविदा, हैप्पी दिवाली
जब मुझे पता चला की राजगढ़ का कोई ब्लॉग है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई और मैंने तुंरत इन्टरनेट पर इसे खोल कर देखा और इसे ज्वाइन कर लिया इस ब्लॉग के लिए मैं राजीव जी को तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हु ,
मैं राजगढ़ का रहने वाला हूँ , राजगढ़ मेरी जन्मभूमि है और मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ और मैं ही क्या वो हर व्यक्ति जो राजगढ़ का निवासी है वो राजगढ़ से बहुत प्यार करता है और करे भी क्यों नहीं ये है ही इतना सुन्दर , चारो और से पहाडियों से घिरा हुआ बाग़, बावडिया मंदिर झरने और बहुत से मनोहर द्रश्य जिन्हें देखकर मन आनंदित हो जाता है
मुझे भी राजगढ़ की बहुत याद आती है जब कभी भी मैं घर जाता हूँ तो वह से आने का दिल ही नहीं करता मगर मजबूरी है की आना पड़ता है अब तो मैं दिवाली पर राजगढ़ जाऊँगा. अपने पुराने दोस्तों से मिलूँगा कुछ दोस्त तो वही राजगढ़ में ही रहते है और कुछ जो बाहर रहते है वो भी दिवाली पर घर आयेंगे, दोस्तों से मिलेंगे घूमेंगे , फिरेंगे , गप्पे लड़ायेंगे , तो दोस्तों मिलते है दिवाली पर अपने प्यारे शहर राजगढ़ में तब तक के लिए अलविदा, हैप्पी दिवाली
Sunday, June 7, 2009
Saturday, May 23, 2009
याद आते हैं ये शिक्षक
गुरुर बह्रमा गुरुर विष्णु ...........
राजगढ़ की कोई भी बात अपने गुरुजनों की बात किये बिना आगे नहीं बढ़ पायेगी। नर्सरी से लेकर बी.कॉम तक के सफर मे जाने कितने शिक्षकों से अ -आ - ई से लेकर जिंदगी की कड़ी सचाई का सामना करने कि शिक्षा मिली। घर की प्रथम पाठशाला में माँ ही प्रथम शिक्षक थी, घर के बाहर न्यू मॉडर्न स्कूल मे अवस्थी सर और दुब्बे मैडम के रूप मे प्रथम विधालय शिक्षक से सम्पर्क हुआ था। बहुत अच्छी तरह याद है कि बिना टॉफी के स्कूल तो जाना ही नहीं होता था। पहले टॉफी और फिर स्कूल।
खैर , ये सौभाग्य रहा कि हर क्लास मे राजगढ़ के बढ़िया गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ। पांचवीं क्लास के बाद से कॉलेज तक का अध्यापन सरकारी विद्यालय - कॉलेज से ही हुआ। घर से बाहर जब पहली बार स्कूल के लिया कदम निकला तो अवस्थी सर के अनुशासन और दुब्बे मैडम के स्नेह वात्सल्य प्रेम से नींव डली । नंबर तीन स्कूल में सतीश सर ने उसे सीचने क्या काम किया। यही कौशल सर ने भी बहुत सहारा दिया जहाँ टयूश्न पड़ने जाते थे। एक घंटे कि जगह दो घंटे और सन्डे को कम से कम तीन घंटे पढाया करते थे। नंबर तीन स्कूल में उस समय के हेडमास्टर प्रहलाद राय जी थे, आपको शिक्षा के क्षे. मे राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। आगे सीनियर सैकंडरी स्कूल में आये तो जयदेव मुखर्जी प्रिंसिपल थे । आप भी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हैं, जिनके सान्निध्य में कुछ समय रहने क्या मौका मिला। यहाँ सहल सर और वशिष्ठजी सर ने अंग्रेजी सुधारने मे बहुत मेहनत की।
वैसे कॉलेज में कहते है सब अपने मन के मालिक है, पर यहाँ भी कुछ अच्छे गुरु मिले। अकाउन्ट्स के विष्णु गुप्ता सर, जिनके पढाने की स्टाइल ऐसी थी कि अकाउन्ट्स जैसा विषय बड़ा आसन लगता था और न उनकी कभी हमको छोड़ने की इच्छा होती थी और न हमारी उनको छोड़ने की। यहाँ वैद सर भी थे जिनसे यदि हम कभी पड़ना नहीं चाहते थे तो भी पूरे कॉलेज मे वो हमहो ढूँढ ही लेते थे और जहाँ हम पकड़ में आए वहीं क्लास चालू चाहे वो कॉलेज की छत हो साइंस लैब या बाहर एक चाय की दुकान ।
यहाँ मैं गजानंद सर को भी कभी नहीं भूल सकता। स्काउट वाले गजानंद सर .. एक स्काउट के रूप मे खुद को कई तरह से विकसित कर पाए। चूल्हे पर खाना बनाना। कैंप को सजाना रात को कैंप मे पहरा देना, न भूलने वाले दिन है वो . सतीश सर ने स्काउट मे शामिल होने के लिये पापा को तैयार किया था और गजानंद सर ने इस स्काउट को राष्ट्रपति स्काउट बना दिया। धन्यवाद सर ,
यहाँ मुझको अपने पापा और ताउजी के रूप में दो ऐसे शिक्षक भी मिले, जिन्होने तर्क, दर्शन और सामाजिक परम्पराओं को समय के साथ देखने का नजरिया और समय के साथ संघर्ष की ताकत दी।
जब मैं अपने शिक्षक याद कर रहा हूँ तो हेडमास्टर प्रहलादराय जी का "बेटी" , लक्ष्मीनारायण सर की "अल्प बचत योजना" ,पीटीआई यादव सर का "ए लड़के ", टूशन के लिये प्रसिद्ध प्रेमप्रकाशजी सिद्ध - "पृथ्वी गोल है घूमकर एक ही जगह आती है " और याद है दीनदयाल जी " तुम पढ़ने कोई आते हो मेरी .... देखने आते हो " के तकिया कलाम भी याद आते हैं।
यहाँ एक शिक्षक को भी याद करना जरूरी है " आजाद हिंद सेना " आठ साल के इस सफर में न जाने कितना कुछ सीखा। एक एक पैसा जोड़कर काफी काम किए। उस समय राजगढ़ में हमारी ये सेना राजगढ़ का सबसे ज्यादा सक्रिय संगठन हो गया था . ( आजाद हिंद सेना पर जल्द ही आ रहा हूं )
आज भी जब इनमे से बहुत से गुरुओ से मुलाकात होती है, तो उनका सान्निध्य आज भी ताकत और प्रेरणा देता हैं
राजगढ़ की कोई भी बात अपने गुरुजनों की बात किये बिना आगे नहीं बढ़ पायेगी। नर्सरी से लेकर बी.कॉम तक के सफर मे जाने कितने शिक्षकों से अ -आ - ई से लेकर जिंदगी की कड़ी सचाई का सामना करने कि शिक्षा मिली। घर की प्रथम पाठशाला में माँ ही प्रथम शिक्षक थी, घर के बाहर न्यू मॉडर्न स्कूल मे अवस्थी सर और दुब्बे मैडम के रूप मे प्रथम विधालय शिक्षक से सम्पर्क हुआ था। बहुत अच्छी तरह याद है कि बिना टॉफी के स्कूल तो जाना ही नहीं होता था। पहले टॉफी और फिर स्कूल।
खैर , ये सौभाग्य रहा कि हर क्लास मे राजगढ़ के बढ़िया गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ। पांचवीं क्लास के बाद से कॉलेज तक का अध्यापन सरकारी विद्यालय - कॉलेज से ही हुआ। घर से बाहर जब पहली बार स्कूल के लिया कदम निकला तो अवस्थी सर के अनुशासन और दुब्बे मैडम के स्नेह वात्सल्य प्रेम से नींव डली । नंबर तीन स्कूल में सतीश सर ने उसे सीचने क्या काम किया। यही कौशल सर ने भी बहुत सहारा दिया जहाँ टयूश्न पड़ने जाते थे। एक घंटे कि जगह दो घंटे और सन्डे को कम से कम तीन घंटे पढाया करते थे। नंबर तीन स्कूल में उस समय के हेडमास्टर प्रहलाद राय जी थे, आपको शिक्षा के क्षे. मे राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। आगे सीनियर सैकंडरी स्कूल में आये तो जयदेव मुखर्जी प्रिंसिपल थे । आप भी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हैं, जिनके सान्निध्य में कुछ समय रहने क्या मौका मिला। यहाँ सहल सर और वशिष्ठजी सर ने अंग्रेजी सुधारने मे बहुत मेहनत की।
वैसे कॉलेज में कहते है सब अपने मन के मालिक है, पर यहाँ भी कुछ अच्छे गुरु मिले। अकाउन्ट्स के विष्णु गुप्ता सर, जिनके पढाने की स्टाइल ऐसी थी कि अकाउन्ट्स जैसा विषय बड़ा आसन लगता था और न उनकी कभी हमको छोड़ने की इच्छा होती थी और न हमारी उनको छोड़ने की। यहाँ वैद सर भी थे जिनसे यदि हम कभी पड़ना नहीं चाहते थे तो भी पूरे कॉलेज मे वो हमहो ढूँढ ही लेते थे और जहाँ हम पकड़ में आए वहीं क्लास चालू चाहे वो कॉलेज की छत हो साइंस लैब या बाहर एक चाय की दुकान ।
यहाँ मैं गजानंद सर को भी कभी नहीं भूल सकता। स्काउट वाले गजानंद सर .. एक स्काउट के रूप मे खुद को कई तरह से विकसित कर पाए। चूल्हे पर खाना बनाना। कैंप को सजाना रात को कैंप मे पहरा देना, न भूलने वाले दिन है वो . सतीश सर ने स्काउट मे शामिल होने के लिये पापा को तैयार किया था और गजानंद सर ने इस स्काउट को राष्ट्रपति स्काउट बना दिया। धन्यवाद सर ,
यहाँ मुझको अपने पापा और ताउजी के रूप में दो ऐसे शिक्षक भी मिले, जिन्होने तर्क, दर्शन और सामाजिक परम्पराओं को समय के साथ देखने का नजरिया और समय के साथ संघर्ष की ताकत दी।
जब मैं अपने शिक्षक याद कर रहा हूँ तो हेडमास्टर प्रहलादराय जी का "बेटी" , लक्ष्मीनारायण सर की "अल्प बचत योजना" ,पीटीआई यादव सर का "ए लड़के ", टूशन के लिये प्रसिद्ध प्रेमप्रकाशजी सिद्ध - "पृथ्वी गोल है घूमकर एक ही जगह आती है " और याद है दीनदयाल जी " तुम पढ़ने कोई आते हो मेरी .... देखने आते हो " के तकिया कलाम भी याद आते हैं।
यहाँ एक शिक्षक को भी याद करना जरूरी है " आजाद हिंद सेना " आठ साल के इस सफर में न जाने कितना कुछ सीखा। एक एक पैसा जोड़कर काफी काम किए। उस समय राजगढ़ में हमारी ये सेना राजगढ़ का सबसे ज्यादा सक्रिय संगठन हो गया था . ( आजाद हिंद सेना पर जल्द ही आ रहा हूं )
आज भी जब इनमे से बहुत से गुरुओ से मुलाकात होती है, तो उनका सान्निध्य आज भी ताकत और प्रेरणा देता हैं
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