बहुत दिनों से इस ब्लॉग पर कोई हलचल नही हुई तो सोचा कुछ लिखू, फिलहाल दक्षिण भारत में हु तो अपने जैसे खाने की तो दिक्कत रहती ही है, सो उसी खान पान को याद कर रहा हु,
बचपन से ही हम सब दोस्तों को बाहर थोड़ा बहुत खाने की आदत रही है, बचपन में जब नम्बर ३ स्कूल में थे (क्लास 6-8) तो बाहर
मूला की चाट खाया करते थे, अब तो शायद नही आता हो वो बंदा (मुझे पक्का पता नही)। वो बहुत फेमस चाट वाला था उस समय, १६-१७ साल हो गए हा इन बातो को।
गोल गप्पे शायद सब लोगो को पसंद हो, गोल चक्कर पर एक ठेले वाला था नाम याद नही आ रहा शायद कोई दोस्त लोग बताएगा, वैसे और भी गोल गप्प्पे वाले लोग थे जैसे की एक बंदा अभी भी सिनेमा हॉल के रस्ते पैर बैठता है उसके यहाँ भी गोलगप्पे विद फूकनी (pipe) पुरानी सीनियर स्कूल के नीचे भी एक आलू टिक्की वाला होता था, वो भी मस्त चाट बनता था हर बार उसको बोलते थे की भैया हरी मिर्ची और प्याज ज्यादा, फ़िर मिर्ची लगने पर एक मीठी पपडी,
गोल चक्कर पर बहुत सारे हलवाई है, वह पर सबसे ज्यादा लोग कचोरी, दही की पकोड़ी एवं बल्ले खाने आया करते है जो शायद अब भी जारी हो|
चाँद पोला की पकोड़ी भी मस्त होती थी लहसुन की चटनी के साथ। अब तो उसने परमानेंट दूकान खोल ली है|
आजाद कुल्फी वाला यह तो हर कोई जानता होगा, अब तो उसके बेटे वो ठेली चलते है लेकिन अभी भी वो ही ठंडक, मिठास बरकरार है, जब कभी भी घर जाते है तो शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब दोस्त लोगो के साथ कुल्फी न खाई हो|
गन्ने का रस पहले बावडी पर पिया करते थे बाद में उसकी क्वालिटी ख़राब हो गई तो फ़िर सब्जी मंडी पर पिया करते थे , फिलहाल माचाडी चौक बस स्टैंड पर सबसे अच्छा मिलता है |
लस्सी पहले गोल चक्कर बहुत लस्सी वालो के पीया करते थे लेकिन आजकल श्री हलवाई के यहाँ सबसे सही मिलती है,
वैसे सब लोगो की अपनी अपनी पसंद है, और भी बहुत सारी चीजे खाने की मिलती है| हो सकता है की कुछ का जिक्र बाकी रहा गया हो तो पाठक लोग कमेंट्स में जोड़ देंगे|
गौरव कुमार